सय्यदुल अम्बिया ﷺ ने इस उम्मत इस उम्मत की तबाही व बर्बादी की एक अलामत "वहन" की बीमारी बताई है, सहाबा किराम ने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह ﷺ "वहन" क्या है? रसूल ए करीम ﷺ ने फरमाया: "दुनिया से मुहब्बत और मौत का ख़ौफ़"। (अबु दाऊद, 4297)
मौत एक ऐसी चीज़ है जिसका ख़ौफ़ बन्दा-ए-मोमिन के दिल में नही होता, क्यूँकि वह जानता है, बल्कि ईमान रखता है कि मौत इसकी ज़िन्दगी का ख़ात्मा नही है बल्कि यह तो अल्लाह तबारक तआला से मुलाक़ात की तरफ एक कदम है, एक ज़रिया है, मौत से बेख़ौफ़ दिल की अलामात अल्लाह ने क़ुरआन-ए-पाक में जगह-जगह बताई है और रसूल-ए-करीम ﷺ ने भी इन्हें बयान किया है:وَ اسْتَعِیْنُوْا بِالصَّبْرِ وَ الصَّلٰوةِؕ-وَ اِنَّهَا لَكَبِیْرَةٌ اِلَّا عَلَى الْخٰشِعِیْنَۙ(۴۵) الَّذِیْنَ یَظُنُّوْنَ اَنَّهُمْ مُّلٰقُوْا رَبِّهِمْ وَ اَنَّهُمْ اِلَیْهِ رٰجِعُوْنَ۠
तर्जुमा:- "और सब्र और नमाज़ से मदद हासिल करो और बेशक़ नमाज़ ज़रूर भारी है मगर इन पर जो दिल से मेरी तरफ झुकते है, जिन्हें यकीन है कि इन्हें अपने रब से मिलना है और इन्हें इसकी तरफ लौट कर जाना है।
(सूरह 2, आयत 45-46)
अल्लाह अपने इन बन्दों से किस खूबसूरती से ख़िताब फरमाता है जो दिल में इससे मुलाकात की तड़प लेकर ज़िन्दगी गुज़ार रहे होते है, इन्ही लोगो की अलामत बताते हुए रसूल-ए-मक़बूल ﷺ ने फ़रमाया: "दुनिया मोमिन के लिए कैदखाना और काफ़िर के लिए जन्नत है। (मुस्लिम), ऐसे बन्दों की जब दुनिया से रुख़्सती होती है तो अल्लाह तआला इनका इस्तक़बाल करते हुए फरमाता है:
یٰۤاَیَّتُهَا النَّفْسُ الْمُطْمَىٕنَّةُۗۖ(۲۷) ارْجِعِیْۤ اِلٰى رَبِّكِ رَاضِیَةً مَّرْضِیَّةًۚ فَادْخُلِیْ فِیْ عِبٰدِیْۙ(۲۹) وَ ادْخُلِیْ جَنَّتِیْ۠
तर्जुमा:- "ऐ इत्मीनान वाली जान, अपने रब की तरफ इस हाल में वापस आ की तू इससे राज़ी हो और वोह तुझसे राज़ी हो, फिर मेरे ख़ास बन्दों में दाख़िल हो जा, और मेरी जन्नत में दाख़िल हो जा
(सूरह 89, आयत 27-30)
अल्लाह से मुलाकात की ख़्वाईश और इसके दामन-ए-रहमत में पनाह की उम्मीद ही तो है जो मोमिन के दिल से मौत का ख़ौफ़ निकाल देती है, क़ुरआन पाक में अल्लाह इन लोगों का ज़िक्र भी किया है जो मौत से डरते है, अल्लाह फ़रमाया है:-
قُلْ یٰۤاَیُّهَا الَّذِیْنَ هَادُوْۤا اِنْ زَعَمْتُمْ اَنَّكُمْ اَوْلِیَآءُ لِلّٰهِ مِنْ دُوْنِ النَّاسِ فَتَمَنَّوُا الْمَوْتَ اِنْ كُنْتُمْ صٰدِقِیْنَ
وَ لَا یَتَمَنَّوْنَهٗۤ اَبَدًۢا بِمَا قَدَّمَتْ اَیْدِیْهِمْؕ-وَ اللّٰهُ عَلِیْمٌۢ بِالظّٰلِمِیْنَ
तर्जुमा:- "तुम फ़रमाओ: ऐ यहूदियों! अगर तुम्हें ये गुमान है कि सिर्फ तुम अल्लाह के दोस्त जो दूसरे लोग नही, तो ज़रा मरने की तमन्ना करो अगर तुम सच्चे हो, और वह कभी मौत की तमन्ना नही करेंगे उन आमाल के सबब जो उनके हाथ आगे भेज चुके है और अल्लाह ज़ालिमों को खूब जानता है।
(सूरह 62, आयत 6-7)
मौत एक ऐसी अटल हक़ीक़त है जिसका सामना इंसान की सारी तरक्की बेबस है, इंसान जब से इस दुनिया में आया है, इसने इस मौत पर काबू पाकी की कोशिश की है, ज़िन्दा रहने और हमेशा रहने की ख़्वाईश ने ही इंसान को बीमारी, बुढ़ापे, आफ़त, मुसीबत और मौत से लड़ना सिखाया लेकिन यह इंसान अपनी तमामतर कोशिश के बावजूद बीमारी से लेकर हर आफ़त पर तो काबू पा लेता है, लेकिन मौत पर काबू न पा सका, अल्लाह पर ईमान का पहला तक़ाज़ा यह है कि हमें इसकी तरफ लौट जाने जाने पर यक़ीन-ए-क़ामिल रखें।
जब हमें इस बात पर यक़ीन पुख़्ता हो जाता है कि हम एक रहमान, रहीम और सत्तर माँओ से ज़्यादा मेहरबान रब के हुज़ूर जाने वाले है, हम इस दिन यानी रोज़े हश्र का तसव्वुर करते हुए एक ऐसी कैफ़ियत के बारे में
रसूलल्लाह ﷺ ने बयान फ़रमाया:- " हज़रत अनस رضي الله تعالى عنه से रिवायत है कि रसूलल्लाह ﷺ ने एक नोजवान के पास गए जो मौत-ओ-हयात की कश्मकश में था, आप ﷺ ने इससे पूछा गया क्या ख़्याल कर रहे हो, इसने कहा ऐ अल्लाह के रसूल ﷺ में अल्लाह तआला के बारे में पुरउम्मीद हूँ लेकिन अपने गुनाहों से डर रहा हुँ, रसूलल्लाह ﷺ ने फरमाया: "जिस आदमी के दिल में जान निकलने के वक़्त दो चीज़े यानी ख़ौफ़ और उम्मीद जमा होती है, अल्लाह वो अता कर देता है जिसको उसे उम्मीद होती है और जिस चीज़ का डर होता है वोह इससे अमान दिला देता है। इसलिए ईमान को ख़ौफ़ और उम्मीद के दरमियान बताया गया है।
यह ख़ौफ़ दुनिया का सबसे बड़ा हथियार है, आप सिर्फ दो फ़ीसद अमवाद वाले कोरोना (Corona) का ख़ौफ़ मुसल्लत करके पूरी दुनिया को यरगमाल बना सकते है, दुनिया तमाम ज़ुल्म, ज़्यादती, जब्र और क़त्ल-ओ-ग़ारत भूल जाती है और मौत के ख़ौफ़ में मुब्तला हो जाती है,
यानी मौत ख़ौफ़ ही तो है जिसे दिल से निकालने की लिए अल्लाह ने क़ुरआन और दीग़र किताबें उतारी और रसूल भेजे...
यही वो ख़ौफ़ है जिसके चलते बहुत से उर्दुनामधारीयों ने बाबरी मस्जिद की शहादत बखुशी कुबूल की और शिर्क को गले लगाया...लेकिन ऐसे लोगों का आख़िरत में ठिकाना जहन्नम और दुनिया में ज़िल्लतों रुस्वाई है...
काफिर की मौत से भी लरजता हो जिसका दिल।
कहता है कौन उससे मुसलमान की मौत मर।
(अल्लामा इक़बाल رحمه الله تعالى عليه)
Comments
Post a Comment
Thank you