"द लास्ट सैल्यूट ख़िलाफ़त उस्मानिया"
1 नवम्बर 1922 का दिन था, 1920 में बनी तुर्की की नेशनल असेंब्ली द्वारा इसी दिन सुल्तानी ख़त्म की गई और फिर 29 अक्तुबर 1923 में तुर्की रिपब्लिक वजूद में आया और अतातुर्क कमाल पाशा सिपहसालार से तुर्की के राष्ट्रपति बने फिर आख़िरकार 3 मार्च 1924 में कमाल पाशा ने ख़िलाफ़त का भी ख़ात्मा कर दिया और उम्मत यतीम हो गई...।
सब्र से जेलख़ाने में रहना
जो मुसीबत पड़े उसको सहना
बूढ़ी अम्मा का कुछ ग़म न करना
कलमा पढ़ के ख़िलाफ़त पे मरन...।
ये उस ख़िलाफ़त का ख़ात्मा था जिसके लिए हिन्दोस्तान में 13 साल लगातार तहरीक ए ख़िलाफ़त चला...।
ये उस ख़िलाफ़त का ख़ात्मा था जिसके लिए 1912 में हिन्दोस्तान के मुसलमान ख़ुद अंग्रेज़ों के ज़ुल्म का शिकार होते हुए भी बालकन युद्ध में उस्मानी तुर्को की मेडिकल मदद के लिए रेड क्रिसेंट सोसाईटी को पहली क़िस्त में मदद के तौर पर जो रक़म भेजी थी वो 185000 ओटमन लीरा थी... इस रक़म को जमा करने के लिए औरतों ने अपने गहने तक बेच डाले थे...।
ये उस ख़िलाफ़त का ख़ात्मा था जिसके लिए डॉक्टर मुख़्तार अहमद अंसारी ने 1911-12 में हुए बालकन युद्ध में ख़िलाफ़त उस्मानिया के समर्थन में मेडिकल टीम की नुमाईंदगी की थी जिसमें उनके साथी थे मौलाना मुहम्मद अली जौहर और दीगर लोग...।
ये उस ख़िलाफ़त का ख़ात्मा था जिसके लिए अब्दुर रहमान पेशावरी नाम के एक हिन्दोस्तानी ने अपनी जान दी थी...।
बक़ौल सर अल्लामा मुहम्मद इक़बाल:
अगर उस्मानियों पर कोहे ग़म टूटा तो क्या ग़म है
के ख़ूने सद हज़ार अंजुम से होती है सहर पैदा
हज़ारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावंर पैदा...।


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