जो मर चुके है उनको रो रही है रहो, खामोश!! ये उम्मत सो रही है,
हैं नहीँ जो मसले उन पर झगड़ रही है,
मसलकों में बंट कर आपस में बिखर रही है,
मोसिकियों पे नाचे गुनाहों में निखर रही है,
कोनसे है बोझ ये, जो कंधो पे ढो रही है ,
रहो  खामोश!! ये उम्मत सो रही है,
जिन के दम पर क़ायम सदा रही ये उम्मत,
दस्तार उन्ही इमामो की अब बिगड़ रही है,
जिनके दामन ने सींचा रो रो के हमको,
उन्ही माओं की गोदें अब उजड़ रही हैं,
दिन पे दिन बदतर हालत हो रही है,
लेकिन फिर भी रहो खामोश!! ये उम्मत सो रही है

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