"ऐ मुसलमानों" तुम सब को ऐसी "कौम" (जमाअत) होना चाहिए, या ऐसी "कौम" (जमाअत) बानो, या ऐसी "कौम" (जमाअत) बन कर रहो जो तमाम टेढ़े लोगो को 'खैर' (या'नी भलाई) की दावत दे,
काफिरों को 'ईमान'की, फसिको को 'तक्वे' की, गाफिलो को 'बेदारी' की, जाहिलों को 'इल्मो मा'रिफत' की, खुश्क मिजाजो को 'लज्जते इश्क' की, सोने वालो को 'बेदारी' की और अच्छे अकीदो, अच्छे अ'मलो',
का जबानी, क'लामी, अ'मली,कुव्वत से, नरमी से, (और हाकिम अपने महकूम को) गरमी से हुक्म दे, और बुरी बातोँ, बुरे अकीदे, बुरे कामों, बुरे ख्यालातों, से लोगो को जुबान, दिल, अमल, कलम से
(अपने-अपने मन्सब के मुताबिक) रोके...!
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